तुम्हारे पिता ने मेरी कोख रुपी धरती पर, प्यार का बीज बोया, मैंने उसे अपने खुन से सींचा, स्नेह, अपनेपन की खाद डाली, उस बीज मेसे जो अंकुर फूटा वो तुम थे।
डॉ. संध्या मेरिया
तुम्हारे पिता ने मेरी कोख रुपी धरती पर, प्यार का बीज बोया, मैंने उसे अपने खुन से सींचा, स्नेह, अपनेपन की खाद डाली, उस बीज मेसे जो अंकुर फूटा वो तुम थे,
नौ महीने अपनी कौख में रखा, तुम्हारे हर एहसास को महेसुस किया मेने, अपने अंश के रूप में तुम्हें अपने हाथों में लिया, तुममें अपना ही चेहरा-मोहरा देखकर मैरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैं रातों को जागी तुम्हें लोरी गाकर सुलाया, अंगुली पकड़कर तुम्हें चलना सिखाया, तोतली जुबान में बोलना सिखाया, जीवन का पहला पाठ मेने ही तुम्हें सिखाया तुम्हें एक-एक पल बढ़ते देखा, वो स्कूल का पहला दिन और तुम्हारा रोना..
तुम ही नहीं तुम्हारे साथ मैं भी रोयी थी, तुम्हारे इम्तिहान नहीं, मेरे इम्तिहान भी होते थे
नतीजा आने पर पास तुम होते थे, खुशी मेरी दुगनी होती थी, तुम यौवन की ओर कदम बढ़ा रहे थे, मैं बुढ़ापे की और जा रही थी, सब कुछ कितना अच्छा था हमारे जीवन में,
किन्तु आज; मां की जगह पत्नी है तुम्हारे लिए सब कुछ !
मैने स्नेह दिया, तुमने तिरस्कार दिया, मेने तुम्हे अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, तुमने भीड में मेरी अंगुली छोड़ दी,
तुम मेरी आन, बान और शान हो, मैं तुम्हारे स्टेटस पर लगा काला धब्बा हूं, मैंने तुम्हे अपनी कौख में रखा, तुमने
मुझे वृद्धाश्रम में रखा ! काश मेरी कोख एक बंजर भूमि होती?
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