डगर।
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डॉ. संध्या मेरिया
कहां ले जाएगी ये डगर भटका हुआ है खुद राहबर।
दोस्त की पीठ में खंजर घोंपते देखा डॉक्टर को किडनी बेचते देखा फाइलों के ढेर तले से रिश्वत लेते अफसरों को देखा।
मास्टर को परीक्षा में कॉपी कराते देखा गली-गली में हुड़दंग होते देखा।
टूटते मंदिर – मस्जिद को देखा बच्चों को बम से खेलते देखा।
युवाओं को सियासी चालें चलते देखा औरतों को दांव पर लगते देखा।
कहां ले जाएगी ये डगर भटका हुआ है खुद राहबर
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