“वो अपनों की यादगार होली”

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पूजा गुप्तामिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)

होली फाल्गुन के महीने में बदलते मौसम के बीच जीवन की आपाधापी में फुर्सत के कुछ पल निकालकर अपनों के बीच हँसी खुशी व्यतीत कर तरोताजा होने का बेहतरीन त्यौहार है। मेरे लिए खास इसलिए है क्योंकि यह मुझे घरवालों, मित्रों और परिचितों के साथ समय बिताकर उनकी नाराजगी दूर करने का मौका देता है और मुझे कुछ समय के लिए तनावमुक्त कर देता है। पुलाव, सब्जी, दही बड़े, कांजी बड़ा, मालपुआ, पूरी , मठरी, ठंढई, इन सारी चीजों के साथ रंग खेलने और खाने पीने की तैयारी और ढेर सारे व्यंजनों से साक्षात्कार का अविस्मरणीय अनुभव होता है।इस दिन की तो बात ही निराली होती है। हर जगह, हर चेहरा रंग बिरंगा। चारों तरफ जहाँ भी नजर घुमाओ रंग ही रंग दिखाई देता है। मानों जमीन पर इंद्रधनुष उतर आया हो। वो बचपन की होली का यादगार पल, जब मैं कई दिन पहले से उत्साहित हुआ करती थी। यहाँ तक कि हफ्ते भर पहले से सपने भी रंग-गुलाल,पिचकारी के आया करते थे।”पापा हमारी पिचकारी सबसे सुंदर होनी चाहिए बस..!”ये एक आदेश होता था पापा के लिए। पापा सबसे सुंदर पिचकारी,गुब्बारे,रंग-गुलाल,बताशे की माला, रंगबिरंगे मुखौटे लाया करते थे। बस फिर हम सब भाई-बहन उनके लाए सामान में बहुत ज्यादा खुश हो जाते थे। होली के दिन सुबह जल्दी होती थी। हम सभी भाई-बहनें सुबह से ही घर के बाहर निकल जाते थे। सुबह वाली होली पानी से खेली जाती थी। शाम के लिए रंग जो बचाना होता था।दोपहर में घर आकर खाना खाकर बाल्टियों में रंग घोलते और पूरी तैयारी के साथ फिर से निकल जाते। नगाड़े वालों की टोलियों पर खूब रंग बरसाते थे।ये सिलसिला अंधेरा होने तक जारी रहता था। पूरे काले कलूटे होकर सब लोग घर लौटते थे। होली के हफ्ते भर बाद ही पहचान में आते थे सबके चेहरे। होली के दूसरे दिन भी दोपहर तक होली खेली जाती थी। लेकिन इस दिन मैं घर से बाहर नहीं निकलती थी, क्योंकि इस दिन कीचड़ से होली खेली जाती थी।मेरे बचपन की होली बहुत ही यादगार थी। कितना हर्षोल्लास होता था उस समय। होली के चार पांच दिन पहले ही होली शुरू होने लगती थी। शुरुआत स्कूल से होती थी। हाथ में रंग-बिरंगे गुलाल लाल, पीले, हरे, गुलाबी रंग लेकर अपनी सहेलियों को लगाने के इंतजार में मैं वहीं परिसर में छुप जाया करती थी। जैसे ही वे स्कूल के रूम से बाहर आती थी तो मैं उन्हें गुलाल लगाकर कहती होली है…बुरा न मानो होली है…!” फिर खूब मस्ती करती थी। स्कूल की सभी शिक्षिकाओं के पैर को छूकर मैं आशीर्वाद जरूर लेती थी उन्हें गुलाल लगाकर। भले ही परीक्षाएं नज़दीक हो मगर, न टीचर , न पालक , न बड़े-बूढ़े कभी रोकते थे, न कभी किसी ने होली खेलने से रोका और न किसी ने रंग लगाने पर बुरा माना।घर पर मम्मी और दादी गुजिया, शक्कड़पारे, निमकी, आदि कुछ दिन पूर्व ही बनाने लगती….और गर्मागरम गुजिया खाने में बहुत मजा आता था। सखी सहेलियाँ, मोहल्ले के पड़ोसी सभी जब मेरे घर आते थे तो व्यंजनों की तारीफ कर जाते थे। छोले-भटूरे माँ बना कर रखती थीं तो बिना खिलाए किसी भी मेहमान को जाने नहीं देती थी। सभी एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलकर एक दूसरे के घर आने का न्यौता भी देते थे। गुजिया पापड़ इतना स्वादिष्ट माँ और दादी बनाती थी कि कभी-कभी माँ की नजरों से बचकर चुपके से एक दो गुजिया निकाल कर मैं खा लेती थी। होलिका दहन वाले दिन दादी उबटन लगाती और होलिका की आग मे फेंकती…फिर वहां बच्चो साथ हो हल्ला मचाती।शादी के बाद से मैंने इस तरह होली नही खेली। बस शादी से पहले कॉलेज के प्री होली सेलिब्रेशन में थोड़ा सा खेल लिया करती थी।कॉलेज के समय का एक यादगार पल मुझे याद है। मेरी प्यारी सी सहेली प्री होली सेलिब्रेशन के दिन खीर बनाकर लाई और मुझे अपने हाथों से खिला रही थी। मेरे पास गुलाबी रंग का गुलाल था। जैसे ही खीर खिलाकर वो स्कूटी से घर ले जाने के लिए उठी, मैंने गुलाल उसके सिर पर डाल दिया और सोने पर सुहागा करने के लिए मैंने चुपके से पक्का सूखा रंग भी उसके सिर पर डाल दिया। उसे लगा सिर्फ गुलाल लगा है। पर वो अपने घर जाते समय गुलाल छुड़ाने के लिए हाथ सिर पर बार-बार फेरने लगी तो गुलाल के साथ वो पक्का लाल चटक रंग भी उसके हाथों में लगता जा रहा था जिसकी वजह से उसका दुपट्टा जो उसने ओढ़ रखी थी वो भी उन रंगों से रंग गया। वो पूरे रास्तें रंग साफ करती रही। घर जाकर जब उसने सिर धोई तो उसे माजरा समझ में आया कि मैंने उसके सिर पर पक्का रंग डाल दिया है। उसने मुझे फोन किया और खूब डांट लगाई। पर अगले ही पल उसे मेरी शैतानी पर जोर से हंसी आई। आज २० साल हो गए इस बात को। उसने आज तक वो दुपट्टा धोई नहीं। मुझे याद करके वो दुपट्टा हर होली आलमारी से निकालती है और मुझे फोन करके जताती है कि, “देखी है ऐसी दोस्ती कहीं…! देख आज तक दुपट्टा रंगा हुआ तेरे हाथों से, मैं कितने प्यार से सम्भाल कर रखी हूं।” बस ये याद मेरे लिए जीवन भर की पूंजी बन गई। अब तो होली के लिए उत्साह ही नही होता। बस भगवान जी और घरवालों को थोड़ा सा गुलाल लगा देते हैं। उनका और बड़ो का आशीर्वाद लेते हैं। उनका आशीर्वाद ही होली की अप्रतिम बधाईयाँ ही त्यौहार है। अब तो मेरे लिए होली का मतलब अच्छा खाना और सोना होता है।(मेरी लिखा हुआ ये लेख पूर्णतः स्वरचित, मौलिक,अप्रकाशित, अप्रसारित है)

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