जब तक मनुष्य परम सत्य की खोज नहीं करता, तब तक वह अपनी वास्तविक प्रकृति और पूर्ण सामर्थ्य को प्राप्त नहीं कर सकता।” — मृणाल मिरी।

जब तक मनुष्य परम सत्य की खोज नहीं करता, तब तक वह अपनी वास्तविक प्रकृति और पूर्ण सामर्थ्य को प्राप्त नहीं कर सकता।” — मृणाल मिरी।
Views: 206
1 0

Read Time:5 Minute, 57 Second

दिल्ली-से सुधीर कुमार

भारत बोध केन्द्र ( इंडिया हैबिटेट सेंटर) के तत्वाधान में आयोजित आईसीपीआर अध्ययन-मंडल व्याख्यान-श्रृंखला के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का विषय था — “पारिवारिक नैतिकता और परम तत्व : गीता के प्रथम दो अध्यायों पर विचार”।मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात दार्शनिक, पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं दर्शनशास्त्र के वरिष्ठ अध्येता मृणाल मिरी उपस्थित रहे। उन्होंने अपने वक्तव्य में गीता के प्रथम दो अध्यायों के आधार पर परिवार, नैतिकता और परम तत्व के गहन संबंध को अत्यंत तार्किक और क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया।उन्होंने कहा कि शिक्षक का सम्मान पिता के समान होना चाहिए, क्योंकि परिवार ही वह प्रथम आधार है जहाँ से नैतिक जीवन का संस्कार प्रारंभ होता है। सत्यनिष्ठा, दया, सम्मान, प्रेम, साहस, निष्ठा और उदारता जैसे सद्गुण नैतिक जीवन की आधारशिला हैं। यदि नैतिक जीवन से सत्यनिष्ठा को अलग कर दिया जाए, तो वह नैतिक जीवन नहीं रह जाता। ये सभी सद्गुण मूलतः पारिवारिक संबंधों में निहित होते हैं। संबंध ही वह भूमि है जहाँ इन गुणों का स्वाभाविक विकास और अभिव्यक्ति संभव होती है; यदि संबंध न हों तो इनका वास्तविक प्रकटीकरण भी संभव नहीं है।उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्य की पूर्ण अभिव्यक्ति भय, दबाव या किसी बाहरी लाभ के कारण नहीं हो सकती। बाहरी प्रेरणा से कहा गया सत्य नैतिक दृष्टि से पूर्ण नहीं होता। परिवार ही वह स्थान है जहाँ मनुष्य पूर्ण और अपूर्ण अभिव्यक्ति के बीच का अंतर सीखता है। अपूर्ण अभिव्यक्ति वस्तुतः अभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि नैतिकता केवल आचरण का प्रश्न नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता से जुड़ी हुई है।मानव स्वभाव पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि कर्म के बिना मनुष्य का अस्तित्व अधूरा है। मनुष्य स्वभावतः सक्रिय है; अतः उसे ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे वह आसक्ति से मुक्त हो सके। गीता में दिए गए उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे दर्पण पर धूल और अग्नि पर धुआँ आच्छादित हो जाता है, वैसे ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप अज्ञान से ढक जाता है। इस अज्ञान का निवारण ही नैतिक साधना का लक्ष्य है।सांख्य दर्शन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मन प्रकृति का अंग है और शरीर का एक विशिष्ट उपकरण है। मन, अहंकार और शरीर इसके प्रमुख घटक हैं। इसके विपरीत आत्मा अव्यक्त और अचिन्त्य है, जिसे इंद्रियों या सामान्य बुद्धि से नहीं जाना जा सकता। इसी महान आत्मा की प्राप्ति की साधना ही नैतिकता का वास्तविक आधार है। मनुष्य को इसके लिए स्वयं को तैयार करना पड़ता है; यह सरल मार्ग नहीं है।उन्होंने यह भी कहा कि एक पाश्चात्य दार्शनिक विडगैसटाइन ने जिस परम शुभ की चर्चा की है, वह देश और काल की सीमाओं से परे है। भारतीय परंपरा में यही परम तत्व सत्–चित्–आनंद के रूप में व्यक्त होता है। जब तक मनुष्य इस परम सत्य की खोज नहीं करता, तब तक वह अपनी वास्तविक प्रकृति और पूर्ण सामर्थ्य को नहीं पहचान सकता।कार्यक्रम की संयोजक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र केंद्र की प्रोफेसर बिंदु पूरी ने अपने वक्तव्य में गीता की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गीता मानव दृष्टि का विस्तार करती है, जीवन में संतुलन स्थापित करती है तथा समाज में सामंजस्य और शांति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करती है।यह व्याख्यान श्रोताओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और चिंतनपरक सिद्ध हुआ। परिवार, नैतिकता और परम सत्य के मध्य संबंध पर प्रस्तुत यह सुव्यवस्थित विचार-विमर्श वर्तमान समय में भी गहन प्रासंगिकता रखता है और मानवीय जीवन के लिए दिशा प्रदान करता है।मीडिया संयोजक विजय जायसवाल ने बताया कि कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों से लगभग 200 प्रोफेसर , शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया एवं कार्यक्रम को सफल बनाया।

Happy
Happy
100 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

You may also like