“सैनिक की सोच”
नफे सिंह योगी मालड़ा महेंद्रगढ़ (हरियाणा)
सीमा ऊपर खड़ा सिपाही , यह सोच रहा था मन में ।अपने हाथोंअपनों खातिर किया न कुछ भी जीवन में ।।बचपन में माँ की ममता का प्यार मिला मुझको भरपूर ।प्रेम पालने में झूला मैं,बन सबकी आंखों का नूर ।।जिस माँ ने गीले मैं सो कर , सूखे में मुझे सुलाया था ।अपने हाथों के झूले में ,दिन-रात मुझे झुलाया था ।।मेरी माँ ममता की मूरत हैआज उसको मेरी जरूरत है।जब बारी आई सेवा की , तो पास नहीं मेरी सूरत है ।।बीमार पड़ी है खटिया पर ,जो लेकर जीवन उलझन में।अपने हाथों अपनों खातिर,किया न कुछ भी जीवन में।।वो बैठ पिता के कंधों पर , बचपन में देखे मेले थे ।बैठा पीठ हर शाम मुझे , हम घोड़ा बनकर खेले थे ।।जब अच्छे अंक आते थे , वो सीने से मुझे लगाते थे ।बैठा गौद में बड़े चाव से , हर रोज मुझे समझाते थे ।।अपने हाथों नहला न सका ,पैरों को मैं सहला न सका ।बैठ पास सुख-दुख की बातें करके दिल बहला न सका।कसम तोड़ कर आ न सका ,जब तक वफादारी तन में ।अपने हाथों,अपनों खातिर किया न कुछ भी जीवन में।।रक्षाबंधन पर जब बहना , भेजती है राखी चिट्ठी में ।गालों के रस्ते पलकों से , मेरे गिरते आँसू मिट्टी में ।।ससुराल अलावा रिश्तेदारी , सब धीरे – धीरे छूट गई ।शादी में शामिल न होने पर, सब यारी दोस्ती टूट गई ।।मैं न रह पाया बच्चों के संग , मेलों और त्योहारों पर ।ड्यूटी में भी लिखता रहता मैं नाम सदा दीवारों पर ।। मिलन हमारा कब होगा दिल सपने देख रहा दिन में ।अपने हाथों,अपनों खातिर,किया न कुछ भी जीवन में।। करे पालन पोषण बच्चों का मन से मात-पिता की सेवा।जान सलामती पतिदेव कि तुमसे दुआ करूँ महादेवा ।।बाधाओं से रुकके लड़ती,वह फौजी की पत्नी कहलती।किस्मत में है त्याग सुशीला, यूँ कहकर मन बहलाती ।।सब माताओं में बड़ी है , वो भारत माता हमको प्यारी है।काटेंगे उस पर उठती उंगली,ये पहली कसम हमारी है।।मां-बाप और भाई-बहन,बसे परिवार प्यार इस मन में।अपने हाथों,अपनों खातिर,किया न कुछ भी जीवन में।।
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