वो “निराला” थे।
पूजा गुप्तामिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल ११, संवत् १९५५, तदनुसार २१ फ़रवरी, सन् १८९९ में हुआ था। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा १९३० में प्रारंभ हुई। उनका जन्म मंगलवार को हुआ था। पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में निराला का विवाह मनोहरा देवी से हो गया। किन्तु यह सुख ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी २० वर्ष की अवस्था में ही हो गयी। बाद में उनकी पुत्री जो कि विधवा थी, की भी मृत्यु हो गयी। वे आर्थिक विषमताओं से भी घिरे रहे। सामाजिक और साहित्यिक संघर्षों को झेलते हुए भी इन्होंने कभी अपने लक्ष्य को नीचा नहीं किया। पत्नी की मृत्यु से तो ये टूट से गये। पर कुटुम्ब के पालन-पोषण का भार स्वयं झेलते हुए वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए।महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया।सरोज स्मृति निराला जी ने सन १९३५ में रचित की जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री जिसका नाम सरोज था जो १८ वर्ष की अवस्था में ही स्वर्ग सिधार गई थी उसकी मृत्यु से व्यथित होकर उसकी स्मृतियों का स्मरण काव्य रूप में किया है इसीलिए उनका ये सृजन जो कि शोकगीत के नाम से प्रसिद्ध है। जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में १५ अक्टूबर १९६१ को उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।’महाप्राण’ निराला की काव्य प्रतिभा पारसमणि के समान है।पारिवारिक और सामाजिक जीवन में विरोध एवं संघर्ष के रहते हुए भी उनके हृदय में काव्य की धारा का अजस्र स्रोत प्रवाहित होता रहा।इसी जीवंतता के कारण इनको ‘महाप्राण’ कवि होने का गौरव प्राप्त हुआ।निराला का सम्पूर्ण काव्य- व्यक्तित्व ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ की उस अवधारणा में जैसे विकसित हुआ,जिसे कवि के समकालीन एवं प्रसिद्ध समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आनन्द की साधनावस्था की उच्चतम रचना-भूमि का कारक तत्त्व स्वीकार किया है।निराला हिन्दी में मुक्त छंद के प्रवर्तक है(जूही की कली) और फिर सबसे कठिन छंद तथा तुक विधान का पालन करते है (तुलसीदास)।एक ओर ‘राम की शक्ति पूजा’ तथा अनेक गीतों में (जागो फिर एक बार, प्रिय मुद्रित दृग खोलो) तत्सम पदावली का आग्रह है,तो दूसरी ओर ‘कुकुरमुत्ता’ में ‘अबे, सुन बे, गुलाब’ की आद्योपांत देशी भंगिमा। श्रृंगार- गीतों में प्रणय की विविध स्थितियों का उन्मुक्त अंकन है,तो फिर ‘जिधर देखिए, श्याम विराजे’ जैसे सघन निष्ठा के आराधना गीत हैं।निराला यहां बिना महाकाव्य लिखे सच्चे महाकवि है।अपने जीवन एवं रचना क्रम में मूलतः विद्रोही होने के बावजूद उनके प्रिय कवि तुलसीदास है।इस प्रकार उनका काव्य ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ का अनेक स्तरीय प्रमाण है।रामचन्द्र शुक्ल ने ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया, निराला उसका रचनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।पूजा गुप्तामिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
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