दमण पुल दुर्घटना मानवसृजित हादसा, जिसे टाला जा सकता था ” : केशव बटाक।

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नये सिरे से पुल निर्माण के बजाय रिपेयर के पैबंद से काम चलाना बना हादसे की वजह * 28 अगस्त 2003 की पुल दुर्घटना की पुनरावृत्ति ना हो इसका प्रशासन रखे ध्यान : केशव बटाक* *लंदन* । ’28 अगस्त 2003 की दमण पुल दुर्घटना’ में अपने दो बेटों को खोने वाले केशव बटाक अब भी इस दर्द से उबर नहीं सके हैं। अगस्त का महीना आते ही उनके चेहरे से हँसी और जिंदगी से खुशी फ़ना हो जाती हैं। कमोबेश यही हाल ‘पुल दुर्घटना’ में अपने मासूम बच्चों को गंवाने वाले सभी 28 माता-पिता का भी है। 1 शिक्षक और 1 राहगीर समेत कुल ’30 निर्दोष’ इस ‘पुल दुर्घटना’ में दिवंगत हुए थे। तभी से ’28 अगस्त 2003 की पुल दुर्घटना’ को दमण के इतिहास का सबसे काला दिन कहा जाता है। ’28 अगस्त’ दमण के मूल बाशिंदों के लिए ‘शोक दिवस’ है। ’28 अगस्त’ को दमण के मूल निवासी कोई खुशी नहीं मनाते हैं। ‘ पुल दुर्घटना’ के ‘पीड़ित’ इस हादसे को ‘दमण पीडब्ल्यूडी के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों’ की ‘भयंकर लापरवाही’ का ‘महा-भयानक’ नतीजा मानते हैं, जिसकी ‘दोषियों’ को ‘अपर्याप्त सज़ा’ मिली। ‘ पुल दुर्घटना’ के इंसाफ के लिए ‘सड़क से प्रशासन’ और ‘सरकार से उच्च न्यायालय’ तक लम्बी लड़ाई लड़ने वालों में से एक केशव बटाक कहते हैं ” यह मानवसृजित हादसा था, जिसे टाला जा सकता था।” तब ‘पुल दुर्घटना विक्टिम कमेटी’ के महामंत्री रहे केशव बटाक आगे कहते हैं ” तब ‘पुल’ को’ नये सिरे से’ बनाने की जरूरत थी। मगर ‘रिपेयर’ का पैबंद ‘लगाया जाता रहा’। नतीजन ‘2 करोड़ की मरम्मत’ के तीसरे महीने ही ‘पुल’ धाराशाही होकर 30 जिंदगियां निगल गया। पुल को रिपेयर करने वाली फर्म और ‘सक्षमता जाँच’ कर पुल को ‘ओके’ करने वाली एजेंसी पर भी कार्रवाई होनी चाहिए थी। ” इस लड़ाई में ‘खोया-पाया’ के सवाल पर केशव बटाक ने कहा ‘ कुछ तो लोग कहेंगे..।’ मालुम हो कि दानह के तत्कालीन सांसद मोहन डेलकर जी के द्वारा लोकसभा में माँग करने पर गृह मंत्री एल.के.आडवाणी जी ने पुल हादसे की जाँच कराने की घोषणा की थी। विक्टिम कमेटी द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने पर कोचर जाँच आयोग गठित हुआ। आयोग की सिफारिशों के अमल में लम्बा समय लगा। 19 वर्षों की लड़ाई पर आए कोर्ट के फैसले में PWD के 2 दोषी अधिकारियों को 2 वर्ष की सजा और 16,500 जुर्माना हुआ। पुल दुर्घटना की इंसाफ की लड़ाई लड़ने वालों में से एक केशव बटाक जो अब लंदन में रहते हैं वो 28 अगस्त 2003 के ब्रिज हादसे के जिक्र पर नम आँखों को पोछते हुए कहते हैं ” ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति नहीं हो इसका प्रशासन को ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि हर कोई अपने ‘ह्दय के टुकड़ों’ को खोकर जीवित नहीं रह सकता है।” *लि.* *केशव बटाक,* *सेन्ट्रल लंदन, यूके*

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